नमो महावदान्याय कृष्ण प्रेम प्रदायते।
कृष्णाय कृष्ण चैतन्य नाम्ने गौरत्विषैः नमः ॥
अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों में यदि जीव के सच्चे मित्र हैं, तो वे केवल भगवान श्रीकृष्ण और उनके भक्त वैष्णवजन ही हैं। जीव की सबसे महान सम्पत्ति कृष्ण प्रेम है।
भगवान श्रीकृष्ण ने अनेको अवतारों में असुरों को मोक्ष, वैकुण्ठ और गोलोक की गति दी, किन्तु कृष्ण प्रेम नहीं दिया।
इसी कृष्ण प्रेम को प्रदान करने के लिए स्वयं श्री राधा कृष्ण ने कलियुग में श्रीमन चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार लिया। उन्होंने बिना भेदभाव के—ब्राह्मण, चाण्डाल, पशु-पक्षी सभी को कृष्ण प्रेम का अमूल्य धन प्रदान किया।
चैतन्य महाप्रभु जी 18 फरवरी 1486 में पश्चिम बंगाल के नवद्वीप धाम मायापुर में श्री शची माता और जगन्नाथ मिश्र जी के घर पर प्रकट हुए।
जिन्होंने हरे कृष्ण महामंत्र को गांव – गांव, नगर-नगर ,और गली-गली तक पहुंचाया और युगधर्म (हरिनाम संकीर्तन) की स्थापना की।
कलियुग अवतारी भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु को कभी स्वयं को भगवान का अवतार घोषित नहीं किया, बल्कि एक आदर्श भक्त का जीवन जीकर यह दिखाया कि भक्त को कैसा आचरण करना चाहिए, ताकि अन्य लोग उनके पदचिह्नों का अनुसरण कर सकें।
हालाँकि, उनका यह दिव्य स्वरूप अनेक प्रमाणिक शास्त्रों में वर्णित है । जैसे कि
1. श्रीमद्भागवत पुराण 11.5.32
कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्रपार्षदम् ।
यज्ञैः सङ्कीर्तनप्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥ ३२ ॥
कलियुग में भगवान ऐसे रूप में अवतरित होंगे जो कृष्ण-वर्ण होंगे (कृष्ण का नाम जप करेंगे), जिनका रंग श्याम नहीं होगा अपितु स्वर्ण रंग का होगा, और जो अपने सहयोगियों सहित संकिर्तन यज्ञ द्वारा पूजित होंगे।
2. महाभारत से प्रमाण
महाभारत, दानधर्म पर्व
सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो
वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी ।
संन्यासकृच्छमः शान्तो
निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥
अर्थ:
कलियुग में भगवान स्वर्णवर्ण शरीर धारण करेंगे, संन्यासी होंगे और शांति तथा भक्ति का प्रचार करेंगे।
3. यो रेमे सहवल्लवी रमयते वृन्दावनेऽहर्निशं यः कंसं निजधान कौरवरणे यः पाण्डवानां सखा। सोऽयं वैष्णवदण्डमण्डितभुजः संन्यासवेशः स्वयं निःसन्देहमुपागतः क्षितितले चैतन्यरूपः प्रभुः ॥९ ॥
(श्लोक ३८ गरुड़पुराण)
जिन प्रभुने श्रीकृष्णचन्द्ररूपमें श्रीवृन्दावन धाममें गोपियोंके साथ रासलीला करते हुए अनेकों क्रीड़ाएँ कीं एवं जिन्होंने कंसको मार डाला, कौरवोंके संग्राममें जो पाण्डवोंके सखा बनकर पार्थसारथी कहलाये, निःसन्देह वे अघटित-घटना-पटीयान् स्वयं-प्रभु संन्यास वेष धारणकर वैष्णव दण्डसे अपनी भुजा सुशोभितकर पृथ्वीतलमें श्रीकृष्णचैतन्यरूपसे पधारेंगे ॥९ ॥
चैतन्य महाप्रभु जी के द्वारा रचित शिक्षाएं
1. अचिंत्यभेदाभेद
2. शिक्षाष्टकम
(1)
चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्नि-निर्वापणं
श्रेयः कैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम्।।
श्रीकृष्ण-संकीर्तन की परम विजय हो, जो वर्षों से संचित मल से चित्त का मार्जन करने वाला तथा बारम्बार जन्म-मृत्यु रूप महादावानल को शान्त करने वाला है। यह संकीर्तन-यज्ञ मानवता का परम कल्याणकारी है क्योंकि यह मंगलरूपी चन्द्रिका का वितरण करता है। समस्त अप्राकृत विद्यारूपी वधु का यही जीवन है। यह आनन्द के समुद्र की वृद्धि करने वाला है और यह श्रीकृष्ण-नाम हमारे द्वारा नित्य वांछित पूर्णामृत का हमें आस्वादन कराता है।
(2)
नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-
स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि
दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नाऽनुरागः॥
हे भगवान्! आपका अकेला नाम ही जीवों का सब प्रकार से मंगल करने वाला है। कृष्ण, गोविन्द जैसे आपके लाखों नाम हैं। आपने इन अप्राकृत नामों में अपनी समस्त अप्राकृत शक्तियाँ अर्पित कर दी हैं। इन नामों का स्मरण और कीर्तन करने में देश-कालादि का कोई नियम भी नहीं है। प्रभो! आपने तो अपनी कृपा के कारण हमें भगवन्नाम के द्वारा अत्यन्त ही सरलता से भगवत्-प्राप्ति कर लेने में समर्थ बना दिया है, किन्तु मैं इतना दुर्भाग्यशाली हूँ कि आपके नाम में मेरा तनिक भी अनुराग नहीं है।
(3)
तृणादपि सुनीचेन,
तरोरपि सहिष्णुना
अमानिना मानदेन ,
कीर्तनीयः सदा हरिः॥
स्वयं को मार्ग में पड़े हुए तृण से भी अधिक नीच मानकर, वृक्ष से भी अधिक सहनशील होकर, मिथ्या मान की भावना से सर्वथा शून्य रहकर दूसरों को सदा ही मान देने वाला होना चाहिए। ऐसी मनः स्थिति में ही वयक्ति हरिनाम कीर्तन कर सकता है।
(4)
न धनं न जनं न सुन्दरीं ,
कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे ,
भवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि॥
हे सर्वसमर्थ जगदीश! मुझे धन एकत्र करने की कोई कामना नहीं है, न मैं अनुयायियों, सुन्दरी स्त्री अथवा सालंकार कविता का ही इच्छुक हूँ। मेरी तो एकमात्र कामना यही है कि जन्म-जन्मान्तर में आपकी अहैतुकी भक्ति बनी रहे।
(5)
अयि नन्दतनुज किङ्करं ,
पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।
कृपया तव पादपंकज-
स्थितधूलीसदृशं विचिन्तय॥
हे नन्दतनुज (कृष्ण)! मैं तो आपका नित्य किंकर (दास) हूँ, किन्तु किसी न किसी प्रकार से मैं जन्म-मृत्युरूपी सागर में गिर पड़ा हूँ। कृपया इस विषम मृत्युसागर से मेरा उद्धार करके अपने चरणकमलों की धूलि का कण बना लीजिए।
(6)
नयनं गलदश्रुधारया
वदनं गद्गद्-रुद्धया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपुः कदा
तव नाम-ग्रहणे भविष्यति॥
हे प्रभो! आपका नाम-कीर्तन करते हुए, कब मेरे नेत्र अविरल प्रेमाश्रुओं की धारा से विभूषित होंगे? कब आपके नाम-उच्चारण करने मात्र से ही मेरा कण्ठ गद्गद् वाक्यों से रुद्ध हो जाएगा और मेरा शरीर रोमांचित हो उठेगा?
(7)
युगायितं निमेषेण
चक्षुषा प्रावृषायितम्।
शून्यायितं जगत् सर्व
गोविन्द-विरहेण मे॥
हे गोविन्द! आपके विरह में मुझे एक निमेष काल (पलक झपकने तक का समय) एक युग के बराबर प्रतीत हो रहा है। नेत्रों से मूसलाधार वर्षा के समान निरन्तर अश्रु प्रवाह हो रहा हैं तथा आपके विरह में मुझे समस्त जगत शून्य ही दीख पड़ता है।
(8)
आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मा-
मदर्शनार्न्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो
मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥
एकमात्र श्रीकृष्ण के अतिरिक्त मेरे कोई प्राणनाथ हैं ही नहीं और वे मेरे लिए यथानुरूप ही बने रहेंगे, चाहे वे मेरा गाढ़-आलिंगन करें अथवा दर्शन न देकर मुझे मर्माहत करें। वे लम्पट कुछ भी क्यों न करें- वे तो सभी कुछ करने में पूर्ण स्वतंत्र हैं क्योंकि श्रीकृष्ण मेरे नित्य, प्रतिबन्धरहित आराध्य प्राणेश्वर हैं।
